रविवार, सितंबर 27, 2009

हम कितने पागल हैं


फूलो को चुने की खातिर काँटों से जख्मी होते हैं ,

जो जोली में आ गिरते थे उन्हें चुने से डर जाते थे ,

जब बारिश बरसा करती थी ... हम छतरी में चुप जाते थे ,

और जलती धुप में नंगे पांव हम चत पर उछला करते थे ,

जब पास वो होता था तो, देख उसको ना सकते थे ,

जब दूर चला जाता था वो, हम आहट उसकी सुनते थे ,

जब सारी दुनिया सोती थी, हम चाँद से खेला करते थे ,

जब सारी दुनिया उठ जाती, हम थक कर सो जाते ,

हम कीतने पागल होते थे.... हम कैसे पागल होते थे ,

हम आज भी वेसे ही पागल हैं........

*<*<* बस तेरा नाम यही तो हैं *<*<*

राहुल कुमार पचोरी

******प्यार का मारा***** प्यार हमार *******

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