बुधवार, अक्टूबर 07, 2009

wo bachpan ki yaande


हा, यांद है मुझे बचपन का वो दिन ,
जब माँ घोटकर पिलाया करती थी ,
काली मिर्ची और नीम की कोमल पत्तिया और ,
में बहादुर बेटा और शाबाश सुनने के लिए पी जाता था ,
उस कड़वाहट को पिने के बाद मेरा मुस्कुराना ,
शायद माँ को बहुत अच्छा लगता था ,
और तब से लेकर मैं निरंतर,
सारी दुनिया की कड़वाहट पी रहा हु और मुस्कुरा रहा हु ,
लेकिन माँ आज मुझे ये कड़वाहट पीते देख कर ,
शाबाश नहीं कहती , अब शयद वो थक गई हैं अपने बेटे को
झूठमूठ का मुस्कुराते देख कर वो चाहती है की मैं
सारी कड़वाहट उखड कर फ़ेंक दू
उसके बाद में मुस्कुराऊ और वो कहे शाबाश ||



कुछ बाते भूली हुई
कुछ पल बीते हुए
हर गलती का एक नया बहाना
और फिर सबकी नज़र में आना
परीक्षा की पूरी रात जागना
फिर भी सवाल देख कर सर खुजलाना
मोका मिला तो अध्यपक की उड़ना
फिर दोस्तों के साथ चाय पिने जाना
उसकी एक जलक देखने रोज़ स्कूल जाना
देखते देखते उसकी यांदो में खो जाना
हर पल एक नया सपना
आज जो टूटा फिर भी है अपना
वो स्कूल के दिन
उन लम्हों में जिंदगी जी ली
यांद कर के उन पलो को , फिर जिंदगी भर मुस्कुराना .

    भीगी पलकों के संग मुस्कुराते हैं हम
    पल पल दिल को बहलाते हैं हम
    तू दूर हैं हमसे तो क्या हुआ
    हर सांस में तेरी आहट पाते हैं हम .

                                                          राहु कुमा चोरी
 ****** प्यार का मारा******प्यार हमारा******


1 टिप्पणी:

गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी ने कहा…

हा, यांद है मुझे बचपन का वो दिन ,
जब माँ घोटकर पिलाया करती थी ,
काली मिर्ची और नीम की कोमल पत्तिया और ,
में बहादुर बेटा और शाबाश सुनने के लिए पी जाता था ,
उस कड़वाहट को पिने के बाद मेरा मुस्कुराना ,
शायद माँ को बहुत अच्छा लगता था ,
और तब से लेकर मैं निरंतर,
सारी दुनिया की कड़वाहट पी रहा हु और मुस्कुरा रहा हु ,
लेकिन माँ आज मुझे ये कड़वाहट पीते देख कर ,
शाबाश नहीं कहती , अब शयद वो थक गई हैं अपने बेटे को
झूठमूठ का मुस्कुराते देख कर वो चाहती है की मैं
सारी कड़वाहट उखड कर फ़ेंक दू
उसके बाद में मुस्कुराऊ और वो कहे शाबाश ||